आद्य शंकराचार्य की दक्षिण पीठ श्रृंगेरी में पहुँची भारत स्वस्तिक यात्रा
मोरारी बापू की पावन यात्रा ने आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों में से पहली पीठ पर नमन किया*

श्रृंगेरी, कर्नाटक, 12 अक्टूबर, 2026:** भारत स्वस्तिक यात्रा आज श्रृंगेरी पहुँची, जहाँ पूज्य मोरारी बापू की रामकथा श्री शारदा पीठम की पावन भूमि पर आयोजित हुई। आद्य शंकराचार्य से परंपरागत रूप से जुड़ी यह पीठ भारत में अद्वैत वेदांत और वैदिक ज्ञान के प्रमुख केंद्रों में से एक है।
श्रृंगेरी आगमन कन्याकुमारी से केदारनाथ की ओर बढ़ रही यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। भारत के दक्षिणी छोर कन्याकुमारी से प्रारंभ होकर, आद्य शंकराचार्य की जन्मभूमि के रूप में पूजित कालड़ी से गुजरने के बाद, यात्रा अब उनकी अद्वैत परंपरा से जुड़ी दक्षिण पीठ पहुँची है।
पूज्य मोरारी बापू ने 12 अक्टूबर को श्रृंगेरी में रामकथा की। इस पावन स्थल पर रामचरितमानस का संदेश गूँजा, जहाँ सदियों से वेदांत, संस्कृत विद्या, उपासना और गुरु-शिष्य परंपरा का संरक्षण एवं संवर्धन होता रहा है।
पूज्य बापू ने कहा, “स्वस्तिक मंगल का प्रतीक है और इसका एक अर्थ हाथ जोड़ना भी है। ऐसे हाथ, जो सबको अपने आलिंगन में समेट लें और सभी को एक सूत्र में जोड़ दें। इसकी भावना एकता, मंगल और सर्वकल्याण में निहित है। इंद्र, सूर्य, गरुड़ और गुरु से जुड़े मंगल के चार स्वरूपों का प्रतिबिंब हनुमान जी में दिखाई देता है। कामना है कि भारत स्वस्तिक यात्रा सभी को सद्भाव और सद्भावना के सूत्र में बाँधने का माध्यम बने।”
पूज्य बापू ने श्रृंगेरी शारदा पीठम जाकर जगद्गुरु शंकराचार्य भारती तीर्थ महासन्निधानम् से भी भेंट की। इस अवसर पर आध्यात्मिक नेतृत्व के बीच आत्मीय एवं सार्थक संवाद हुआ और पुरानी स्मृतियाँ भी ताज़ा हुईं।
आद्य शंकराचार्य से जुड़ी भारत की आध्यात्मिक परंपरा में श्रृंगेरी का विशिष्ट स्थान है। मान्यता है कि शंकराचार्य ने यहाँ पर्याप्त समय व्यतीत किया और शारदा पीठम की स्थापना की। उन्होंने अपने शिष्य सुरेश्वराचार्य को इस पीठ का दायित्व सौंपा। कालांतर में यह पीठ अद्वैत वेदांत, वैदिक विद्वत्ता और आध्यात्मिक शिक्षा के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुई।
**श्रृंगेरी शारदा पीठम के शंकराचार्य** ने भारत स्वस्तिक यात्रा के शुभारंभ के अवसर पर कन्याकुमारी में अपने प्रतिनिधि भेजे थे। इस प्रकार आद्य शंकराचार्य से जुड़ी आध्यात्मिक परंपरा ऐतिहासिक यात्रा के शुभारंभ का हिस्सा बनी। इस अवसर पर विभिन्न आध्यात्मिक नेतृत्वकर्ताओं, गणमान्य व्यक्तियों, श्रद्धालुओं और स्थानीय समुदाय के सदस्यों ने भी सहभागिता की।
इस यात्रा की पहली कथा का शुभारंभ **श्रृंगेरी शारदा पीठम के प्रतिनिधियों द्वारा स्वस्ति वाचन** के साथ हुआ था। इसके माध्यम से यात्रा की मंगलमय सफलता और आगामी पड़ावों के लिए आशीर्वाद की कामना की गई। इसके बाद **श्रृंगेरी शारदा पीठम के शंकराचार्य श्री आनंद** का विशेष वीडियो संदेश प्रदर्शित किया गया, जिसमें उन्होंने भारत स्वस्तिक यात्रा और उसके आध्यात्मिक एवं राष्ट्रीय एकात्मता के व्यापक उद्देश्य के लिए अपनी शुभकामनाएँ और आशीर्वाद दिए।
आद्य शंकराचार्य की विरासत के संदर्भ में यह संबंध विशेष महत्त्व रखता है। परंपरा के अनुसार, उन्होंने भारत की चारों दिशाओं में चार प्रमुख पीठों की स्थापना की थी—दक्षिण में श्रृंगेरी, पश्चिम में द्वारका, पूर्व में पुरी और उत्तर में ज्योतिर्मठ। ये चारों पीठ मिलकर देशव्यापी आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतिनिधित्व करती हैं।
भारत स्वस्तिक यात्रा भी इसी व्यापक सभ्यतागत और आध्यात्मिक परिदृश्य से होकर गुजर रही है। यात्रा का पहला चरण 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से प्रारंभ हुआ और 23 अक्टूबर को केदारनाथ में संपन्न होगा। इस दौरान यात्रा अनेक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों से होकर गुजरेगी। इसका उद्देश्य भारत की विविध परंपराओं और पवित्र स्थलों को एक व्यापक राष्ट्रीय एवं आध्यात्मिक सूत्र में पिरोना है।
भारत स्वस्तिक यात्रा के अंतर्गत पूज्य मोरारी बापू के साथ लगभग **900 श्रद्धालु 9,000 किलोमीटर की यात्रा** करेंगे। इस यात्रा के लिए दो विशेष रेलगाड़ियों—**कैलाश भारत गौरव ट्रेन** और **चित्रकूट भारत गौरव ट्रेन**—की व्यवस्था की गई है। इनमें क्रमशः 22 और 16 डिब्बे हैं।
भारत स्वस्तिक यात्रा का आयोजन **संतकृपा सनातन संस्थान** द्वारा किया जा रहा है। इस यात्रा में विभिन्न क्षेत्रों और जीवन के अलग-अलग वर्गों से जुड़े श्रद्धालु एवं लोग सम्मिलित हो रहे हैं।
मिराज ग्रुप के चेयरमैन और संतकृपा सनातन संस्थान के मैनेजिंग ट्रस्टी मदन पालीवाल ने कहा, “श्रृंगेरी एक ऐसी जीवंत परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने पीढ़ी-दर-पीढ़ी आद्य शंकराचार्य की शिक्षाओं को आगे बढ़ाया है। भारत स्वस्तिक यात्रा को इस पावन पीठ तक लाना हमारे लिए अत्यंत अर्थपूर्ण है, क्योंकि इससे हमारी यात्रा उस परंपरा से जुड़ती है, जो आज भी ज्ञान, विद्या और गुरु-शिष्य परंपरा को संरक्षित कर रही है। इस निरंतर आध्यात्मिक विरासत का हिस्सा बनना हमारे लिए सौभाग्य की बात है।”
श्रृंगेरी में पूज्य मोरारी बापू की उपस्थिति भारत की आध्यात्मिक विरासत की दो महत्त्वपूर्ण धाराओं को एक साथ लाती है—**रामायण एवं रामचरितमानस की परंपरा और आद्य शंकराचार्य से जुड़ी अद्वैत वेदांत की परंपरा।**
कन्याकुमारी से कालड़ी और अब श्रृंगेरी तक पहुँचकर यह यात्रा दक्षिण भारत के विशिष्ट आध्यात्मिक मानचित्र को रेखांकित कर रही है। यहाँ से आगे बढ़ते हुए यह उत्तर के हिमालयी क्षेत्रों की ओर प्रस्थान करेगी। श्रृंगेरी का पड़ाव इस यात्रा में एक और महत्त्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है—ऐसी पीठ का अध्याय, जिसने पीढ़ियों से अद्वैत परंपरा और आद्य शंकराचार्य की विरासत को संरक्षित रखा है।
पूज्य मोरारी बापू की रामकथाओं में निरंतर प्रतिध्वनित होने वाले **सत्य, प्रेम और करुणा** के संदेश को भारत स्वस्तिक यात्रा देशव्यापी आध्यात्मिक यात्रा के रूप में आगे बढ़ाती है। यात्रा के दौरान आयोजित रामकथा और अन्य कार्यक्रम सभी के लिए खुले हैं। प्रत्येक पड़ाव पर प्रसाद स्वरूप **भंडारे (शाकाहारी सामुदायिक भोजन)** की व्यवस्था भी की जा रही है।





